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    . तपै लागि अब जेठ असाढ़ी। मोहि पिउ बि छाजनि भइ गाढ़ी।।तन तिनउर भा, झूरौं खरी। भइ बरखा, दुख आगरि जरी।।इस पूरे कड़वक में नागमती की विरह-दशा के बारे में
    Question

    . तपै लागि अब जेठ असाढ़ी। मोहि पिउ बि छाजनि भइ गाढ़ी।।
    तन तिनउर भा, झूरौं खरी। भइ बरखा, दुख आगरि जरी।।
    इस पूरे कड़वक में नागमती की विरह-दशा के बारे में यह विचार किसका है?
    "यह आशिक माशूकों का निर्लज्ज प्रलाप नहीं है; यह हिन्दू गृहिणी की विरहवाणी है। इसका सात्विक मर्यादापूर्ण माधुर्य मनोहर है।'

    A.

    चन्द्रबली पांडेय

    B.

    रामचंद्र शुक्ल

    C.

    माताप्रसाद गुप्त

    D.

    श्याम मनोहर पांडेय

    Correct option is B

    ans.(b)

    उपर्युक्त विचार आचार्य रामचंद्र शुक्ल का है। उन्होंने पद्मावत में नागमती की विरह-दशा को गहनता से समझा और इसे प्रेमगाथा की परम्परा में सबसे प्रौढ़ और सरस काव्य के रूप में स्वीकार किया। रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, यह सिर्फ प्रेमियों का प्रलाप नहीं है, बल्कि यह एक आदर्श हिन्दू गृहिणी की विरहवाणी है। इसका माधुर्य और सात्विकता इसे मनोहर और अद्वितीय बनाते हैं।

                                                       

                                                                           . तपै लागि अब जेठ असाढ़ी। मोहि पिउ बि छाजनि भइ गाढ़ी।।

                                                                                  तन तिनउर भा, झूरौं खरी। भइ बरखा, दुख आगरि जरी।।

    व्याख्या:
    यह काव्यांश मलिक मुहम्मद जायसी के प्रसिद्ध महाकाव्य 'पद्मावत' से लिया गया है। इस काव्यांश में नागमती के विरह और उसकी आंतरिक पीड़ा का मार्मिक चित्रण किया गया है।

    शब्दार्थ और व्याख्या:

    1. तपै लागि अब जेठ असाढ़ी:
      नागमती कहती हैं कि मेरे लिए जेठ और आषाढ़ (गर्मियों और वर्षा ऋतु) भी तपती हुई ऋतुएं बन गई हैं। ऋतु का परिवर्तन मेरे जीवन में सुख नहीं ला रहा क्योंकि मेरे प्रिय (पिय) मुझसे दूर हैं।

    2. मोहि पिउ बि छाजनि भइ गाढ़ी:
      मेरे प्रिय (पति) मुझे छोड़कर चले गए हैं, और उनके बिना मेरी स्थिति अत्यधिक कष्टदायक हो गई है। ‘गाढ़ी’ शब्द से गहरी व्यथा और पीड़ा का संकेत मिलता है।

    3. तन तिनउर भा, झूरौं खरी:
      मेरे शरीर की स्थिति ऐसी हो गई है जैसे सूखता हुआ तिनका (तिनउर) हो, और मैं अंदर ही अंदर झुरती जा रही हूं। यह पंक्ति नागमती की आंतरिक पीड़ा और शारीरिक दुर्बलता को व्यक्त करती है।

    4. भइ बरखा, दुख आगरि जरी:
      वर्षा ऋतु के आगमन के बावजूद, मेरी पीड़ा और बढ़ गई है। जहां दूसरों के लिए बरसात सुख और आनंद लाती है, वहीं मेरे लिए यह दुखों की आग बन गई है।

      Information Booster:

      जायसी के संदर्भ मे शुक्लजी के अन्य कथन :

      1. जायसी बड़े भावुक 'भगवद्दत्त' थे और अपने समय में बड़े ही सिद्ध और पहुँचे हुए फकीर माने जाते थे; परंतु कबीरदास के समान अपना एक निराला पंथ निकालने का हौसला इन्होंने कभी न किया। जिस मिल्लत या समाज में इनका जन्म हुआ, उसके प्रति अपने विशेष कर्तव्यों के पालन के साथ-साथ वे सामान्य मनुष्य-धर्म के सच्चे अनुयायी थे।

      2. जायसी सूफियों के अद्वैतवाद तक ही नहीं रहे हैं; वेदान्त के अद्वैतवाद तक भी पहुँचे हैं। भारतीय मतमतांतरों की उन्होंने अधिक झलक है।

      3. जायसी की वाक्य-रचना स्वच्छ होने पर भी तुलसी के समान सुव्यवस्थित नहीं है। उसमें जो वाक्य-दोष मुख्यतः दिखाई पड़ता है वह 'न्यून पदत्व' है। विशेषणों का लोप, संबंधवाचक सर्वनामों का लोप, अन्यों का लोप जायसी में बहुत मिलता है।

      4. जायसी के श्रृंगार में मानसिक पक्ष प्रधान है, शारीरिक गुण नहीं।

      5. पद्मावत सूफी काव्यधारा की सबसे प्रौढ़ एवं सरस रचना है।

      6. पद्मावत हिंदी का प्रथम बड़ा महाकाव्य है।

      7. पद्मावत भक्तिकाल का वेद-बाव है।

      8. पद्मावत में प्राचीन की परंपरा पूर्ण प्रौढ़ता को प्राप्त हुई है। यह उस परंपरा में सबसे अधिक प्रसिद्ध ग्रंथ है।

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