Correct option is A
सही उत्तर:A सधुक्कड़ी
व्याख्या:
कबीरदास की भाषा को सधुक्कड़ी कहा जाता है। यह एक मिश्रित भाषा थी, जिसमें अवधी, ब्रजभाषा, खड़ीबोली, राजस्थानी और पंजाबी के शब्दों का प्रयोग मिलता है। कबीरदास का उद्देश्य था अपने उपदेशों को सरल और आम जनता के लिए समझने योग्य बनाना, इसलिए उन्होंने इस लोकभाषा का उपयोग किया।
सधुक्कड़ी भाषा को 'संतों की भाषा' भी कहा जाता है, क्योंकि इस भाषा का प्रयोग संतों और भक्त कवियों द्वारा अपने संदेशों को व्यापक रूप से फैलाने के लिए किया गया था।
सूचना बूस्टर:
● कबीरदास की भाषा में साधारणता और सरलता थी, ताकि उनके संदेश सभी वर्गों तक पहुँच सकें।
● यह भाषा स्थानीय बोलियों का मेल थी, इसलिए इसे सधुक्कड़ी कहा जाता है।
● उनकी रचनाएँ मुख्यतः साखी, रमैनी और पद के रूप में मिलती हैं।
● कबीर ग्रंथावली और आदि ग्रंथ में उनके पद संगृहीत हैं।
● उनकी भाषा में तात्कालिक समाज की सच्चाइयों का जीवंत चित्रण मिलता है।
अन्य विकल्पों का विश्लेषण:
- खड़ीबोली: यह आधुनिक हिंदी की आधारभूत भाषा है, लेकिन कबीरदास के समय इसका प्रचलन नहीं था।
- कन्नौजी: यह क्षेत्रीय बोली है, जो केवल कन्नौज और उसके आसपास प्रचलित थी।
- ब्रज: यह भक्तिकाल के अन्य कवियों जैसे सूरदास और तुलसीदास की प्रमुख भाषा थी, परंतु कबीर ने इसका प्रयोग सीमित रूप में किया।
अतः कबीरदास की भाषा 'सधुक्कड़ी' थी।