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​हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी।तुम देखी सीता मृग नेनी।। – इस पदांश में किस अलंकार की योजना है?​
Question

हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी।
तुम देखी सीता मृग नेनी।।
इस पदांश में किस अलंकार की योजना है?

A.

मानवीकरण

B.

उपमा

C.

उत्प्रेक्षा

D.

रूपक

Correct option is A

सही उत्तर: विकल्प (A) है।
व्याख्या:
"हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम देखी सीता मृग नेनी।।" इस पदांश में मानवीकरण अलंकार की योजना की गई है। मानवीकरण में किसी निर्जीव या अप्राकृतिक वस्तु को मनुष्य की तरह व्यवहार या गुण दिए जाते हैं। यहां पक्षियों और मृगों को मानवीय रूप में प्रस्तुत किया गया है, जैसे सीता का मृग के रूप में देखना, जो एक मानवीय कल्पना है।
सभी विकल्पों का विश्लेषण:
विकल्प
व्याख्या
A. मानवीकरण
इस पदांश में पक्षियों और मृगों को मानवीय गुण दिए गए हैं, जैसे सीता का मृग के रूप में देखना। यह सही उत्तर है।
B. उपमा
उपमा में किसी वस्तु की तुलना किसी अन्य से की जाती है, लेकिन यहां ऐसी कोई तुलना नहीं की गई है।
C. उत्प्रेक्षा
उत्प्रेक्षा में किसी चीज़ के होने की संभावना का चित्रण होता है, यह इस उदाहरण में नहीं है।
D. रूपक
रूपक में किसी वस्तु या घटना का वर्णन उसके वास्तविक रूप से अलग किसी प्रतीक के रूप में किया जाता है, जो इस उदाहरण में नहीं है।
अतिरिक्त जानकारी:
अलंकार की परिभाषा:
‘अलंकार’ संस्कृत के दो शब्दों ‘अलम्’ (अर्थात् शोभा) और ‘कार’ (अर्थात् करने वाला) से मिलकर बना है।
जिस प्रकार आभूषण किसी वस्तु को सुन्दर बनाते हैं, उसी प्रकार अलंकार भाषा, काव्य, कविता या वाणी को शोभायुक्त, प्रभावशाली और मनोहर बनाते हैं।
अलंकार के प्रकार:
अलंकार के भेद
प्रकार
परिभाषा 
उदाहरण 
शब्दा अलंकार-
काव्य मे शब्दगत चमत्कार को शब्दा अलंकार कहते है।
अनुप्रास
जहाँ काव्य में एक या अनेक व्यंजन वर्षों की पास-पास तथा क्रमानुसार आवृत्ति हो, उसे 'अनुप्रास अलंकार' कहते हैं। 
चारु चन्द्र की चंचल किरणें, खेल रही थी जल-थल में।
यमक
यमक का शाब्दिक अर्थ 'युग्मक अर्थात् जोड़ा' है। जहाँ एक शब्द या शब्द समूह की एक साथ या अलग-अलग पद में आवृत्ति हो किन्तु उनका अर्थ प्रत्येक बार भिन्न हो, वहाँ यमक अलंकार होता है। यमक अलंकार में शब्द की दो बार आवृत्ति होती है। 
जेते तुम तारे, तेते नभ में न तारे हैं
श्लेष
श्लेष का शाब्दिक अर्थ होता है-चिपका हुआ। जहाँ एक शब्द जोड़े के रूप में उपस्थित न होकर अलग-अलग कथन में उपस्थित होता है और प्रत्येक बार उसका अर्थ अलग होता है। वहाँ श्लेष अलंकार होता है। 
रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै, मोती मानुष चून।
पुनरुक्ति
पुनरुक्ति का शाब्दिक अर्थ है- 'पुनः दोहराना'। जब किसी काव्य में सौन्दर्यता उत्पन्न करने के लिए एक ही शब्द को दो बार दोहराया जाता है, वहाँ पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार होता है। इस अलंकार में शब्द की आवृत्ति तो दो बार होती है, परन्तु उसके अर्थ में कोई परिवर्तन नहीं होता। 
ठौर-ठौर विहार करती सुन्दरी सुरनारियाँ।
विप्सा
जब किसी काव्य में आदर, हर्ष, शोक, आश्चर्य, घृणा, मन के भाव आदि को को प्रकट करने के लिए एक शब्द की पुनरावृत्ति होती है, तो वहाँ वीप्सा अलंकार होता है। 
बार-बार गर्जन वर्षण है मूसलधार, हृदय थाम लेता संसार सुन-सुन घोर वज्र हुंकार।
वक्रोक्ति
जहाँ पर वक्ता (बोलने वाला) द्वारा किसी भिन्न अभिप्राय से व्यक्त किए गए कथन का श्रोता (सुनने वाला) अपने अनुसार भिन्न अर्थ की कल्पना कर लेता है, वहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है। इसके दो भेद हैं- श्लेष वक्रोक्ति और काकु वक्रोक्ति।
को तुम हो इत आये कहा, घनश्याम हो तू कितू बरसों।
अर्था अलंकार-
साहित्य मे अर्थगत चमत्कार को अर्था अलंकार कहते है। 
उपमा
समान धर्म के आधार पर जहाँ एक वस्तु की समानता या तुलना किसी दूसरी वस्तु से की जाती है, वहाँ उपमा अलंकार होता है।

मखमल के झूले पड़े, हाथी सा टीला

रूपक

जहाँ उपमेय में उपमान का निषेधरहित आरोप हो अर्थात् उपमेय और उपमान को एक रूप कह दिया जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है। 

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।

उपेक्षा

जहाँ उपमेय में उपमान की सम्भावना व्यक्त की जाए, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। इसमें जनु, मनु, मानो, जानो, इव जैसे वाचक शब्दों का प्रयोग होता है। उत्प्रेक्षा के तीन भेद हैं-वस्तूत्प्रेक्षा, हेतूत्प्रेक्षा और फलोत्प्रेक्षा।

सिर फट गया उसका वहीं। मानो अरुण रंग का घड़ा हो।

मानवीकरण

जहाँ प्राकृतिक वस्तुओं; जैसे-पेड़, पौधे, बादल आदि में मानवीय भावनाओं का वर्णन हो या निर्जीव वस्तुओं की सजीव के रूप में चित्रित किया गया हो वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है। 

फूल हँसे कलियाँ मुसकाई।

विरोधाभास

जहाँ वास्तविक विरोध न होने पर भी विरोध का आभास हो, वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है। 

या अनुरागी चित्त की, गति समुझे नहिं कोय। ज्यों ज्यों बूड़े स्याम रंग, त्यों त्यों उजलों होय।

सन्देह

जहाँ अति सादृश्य के कारण उपमेय और उपमान में अनिश्चय की स्थिति बनी रहे अर्थात् जब उपमेय में अन्य किसी वस्तु का संशय उत्पन्न हो जाए, तो वहाँ सन्देह अलंकार होता है

सारी बीच नारी है या नारी बीच सारी है, कि सारी की नारी है कि नारी की ही सारी।

अतिशयोक्ति

जहाँ किसी विषयवस्तु का लोकमर्यादा के विरुद्ध बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया जाता है, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है। 

हनुमान की पूँछ में, लगन न पाई आग। सारी लंका जरि गई, गए निशाचर भाग।

28 और प्रकार है।


उभया अलंकार-

जो शब्द और अर्थ दोनों मे चमत्कार की वृद्धि करते है।

संसृस्टि

जहाँ दो अथवा दो से अधिक अलंकार परस्पर मिलकर भी स्पष्ट रहे अर्थात् उनकी पहचान में किसी भी प्रकार की कोई कठिनाई नहीं होती वहाँ 'संसृष्टि' अलंकार होता है। 
भूपति भवनु सुभायँ सुहाव। सुरपति सदनु न परतर पावा। मनिमय रचित चारु चौबारे। जनु रतिपति निज हाथ सँवारे ।।

संकर

संकर जहाँ पर दो या अधिक अलंकार आपस में 'नीर-क्षीर' के समान रूप से घुले-मिले रहते हैं, वहाँ 'संकर' अलंकार होता है। 

सठ सुधरहिं सत संगति पाई। पारस-परस कुधातु सुहाई।

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