Correct option is B
परिचय: न्याय दर्शन में 'हेत्वाभास' वे दोष हैं जो हेतु (कारण या तर्क) में होते हुए भी हेतु के समान प्रतीत होते हैं, जिससे सही अनुमान नहीं हो पाता। अन्नम्भट्ट ने अपनी 'तर्कसंग्रह' में इनका वर्णन किया है।
व्याख्या: अन्नम्भट्ट के अनुसार हेत्वाभास के पाँच भेद हैं, जिनका क्रम 'तर्कसंग्रह' में इस प्रकार है:
1.
सव्यभिचारः (C): (अनैकान्तिक) यह हेतु का सबसे सामान्य दोष है, जो साध्य के साथ अनिश्चित रूप से संबंधित होता है (जैसे 'पर्वतो वह्निमान् धूमात्' में, यदि धुआँ आग के बिना भी हो)।
2.
विरुद्धः (E): यह हेतु साध्य का विरोधी होता है, अर्थात् जहाँ हेतु रहता है, वहाँ साध्य का अभाव सिद्ध होता है।
3.
सत्प्रतिपक्षः (A): जब एक हेतु द्वारा साध्य सिद्ध हो रहा हो, और एक अन्य समान बलवान् हेतु उसी साध्य के अभाव को सिद्ध कर रहा हो।
4.
असिद्धः (D): यह हेतु स्वयं ही अप्रमाणित या अविद्यमान होता है, इसलिए यह अनुमान नहीं करा सकता।
5.
बाधितः (B): जब हेतु द्वारा सिद्ध किया जाने वाला साध्य, किसी अन्य प्रबल प्रमाण (जैसे प्रत्यक्ष) द्वारा पहले से ही बाधित (झूठा सिद्ध) हो चुका हो।
अतः, अन्नम्भट्ट द्वारा दिए गए क्रम के अनुसार, सही संयोजन
C, E, A, D, B है, जो विकल्प
(b) में दिया गया है।
रोचक तथ्य: हेत्वाभास के इन पाँचों भेदों को नैयायिकों द्वारा 'पंच हेत्वाभास' कहा जाता है।
·
असिद्ध के तीन मुख्य भेद होते हैं: आश्रयासिद्ध, स्वरूपासिद्ध और व्याप्यत्वासिद्ध।
· हेत्वाभास को समझने का मुख्य उद्देश्य अनुमान (तर्क) की प्रक्रिया में आने वाली त्रुटियों को पहचानना और शुद्ध तर्क की स्थापना करना है।