Correct option is C
राग
मारवा को संधिप्रकाश राग के रूप में जाना जाता है, और इसे
संध्या काल (सायं 4 बजे से 7 बजे तक) में गाया जाता है। यह राग मारवा थाट से उत्पन्न होता है और इसमें विशेष रूप से
कोमल ऋषभ,
तीव्र मध्यम, और
पंचम का वर्ज्य होता है। इसका वादी स्वर
कोमल रे और संवादी स्वर
ध होता है। राग मारवा को
शुष्क और चंचल राग माना जाता है, जो दिन के अंतिम प्रहर में गाया जाता है।
मारवा राग को विशेष रूप से संधिप्रकाश राग माना जाता है क्योंकि इसका गायन समय संध्या काल (शाम के अंतिम समय) होता है, जो इसे विशेष बनाता है। यह राग अपने गंभीर और शुष्क स्वरों के कारण ख्याल गायन में अधिक प्रयोग होता है, खासकर धीमे और संजीदा रचनाओं में।
मुख्य बिंदु:
1.
मारवा राग: यह मारवा थाट का राग है और इसमें पंचम का वर्ज्य होता है।
2. इसे
संधिप्रकाश राग कहा जाता है, क्योंकि इसका गायन समय संध्या काल (सायं 4 बजे से 7 बजे तक) होता है।
3. राग मारवा की प्रकृति
शुष्क और
चंचल होती है, जिससे यह अन्य रागों से अलग होता है।
4. इस राग में
कोमल रे (ऋषभ) और
ध (संवादी स्वर) प्रमुख होते हैं।
5. यह राग अक्सर बड़े ख्याल और मसीतखानी गत में कम प्रयोग किया जाता है, बल्कि इसमें अधिकतर
धीमी गति और
मधुरता होती है।