कर्मभूमि मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित एक सामाजिक एवं आदर्शवादी उपन्यास है, जो भारतीय समाज में व्याप्त सामाजिक, धार्मिक, और राजनीतिक समस्याओं को उजागर करता है। यह उपन्यास पहली बार 1932 में प्रकाशित हुआ था।
उपन्यास का नायक अमरकांत एक आदर्शवादी युवक है जो सच्चाई, ईमानदारी और मानवता में विश्वास रखता है। वह अंग्रेज़ों की गुलामी, समाज में व्याप्त ऊँच-नीच, जातिवाद और धार्मिक पाखंड के विरोध में खड़ा होता है। अमरकांत का जीवन संघर्ष, त्याग और सेवा का प्रतीक बन जाता है। उसकी पत्नी सुखदा पारंपरिक विचारों की है, जिसके कारण दोनों के बीच विचारों का टकराव होता है। अमरकांत समाज सुधार और जनसेवा के मार्ग पर निकलता है। वह किसानों और मजदूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष करता है और सत्य तथा अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए लोगों में जागरूकता फैलाता है।
मुंशी प्रेमचंद ने इस उपन्यास के माध्यम से यह संदेश दिया है कि मनुष्य का सच्चा धर्म कर्म है। समाज की भलाई के लिए निस्वार्थ भाव से कार्य करना ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य होना चाहिए। कर्मभूमि केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि एक विचारधारा है — जो पाठक को जीवन में सत्य, सेवा और कर्तव्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। यह प्रेमचंद की सबसे विचारोत्तेजक और प्रेरणादायी कृतियों में से एक मानी जाती है।