गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए), 1967_00.1
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गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए), 1967

 

प्रासंगिकता

 

  • जीएस 3: सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियां और उनका प्रबंधन – आतंकवाद के साथ संगठित अपराध का संबंध

 

प्रसंग

 

  • यूएपीए अधिनियम के तहत जमानत नहीं मिलने के कारण फादर स्टेन स्वामी की जेल में मृत्यु हो गई। यह अधिनियम की ओर पुनः ध्यान आकर्षित करता है।

 

 

प्रमुख बिंदु

 

  • स्टेन स्वामी एक जेसुइट धर्माचार्य थे, जिनकी मृत्यु नौ माह से जमानत की प्रतीक्षा उपरांत हुई थी।
  • उन्हें राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने भीमा कोरेगांव हिंसा के संबंध में यूएपीए के अंतर्गत  निरुद्ध किया था।
  • उनकी मौत ने पुनः एक बार यूएपीए की विश्वसनीयता पर सुर्खियां बटोरीं।

 

यूएपीए की पृष्ठभूमि

 

  • अधिनियम व्यक्तियों और संगठनों की कतिपय गैरकानूनी गतिविधियों की रोकथाम करने के लिए अधिनियमित किया गया था।
  • अधिनियम के 1967 के संस्करण ने भारत की संप्रभुता और अखंडता को क्षीण करने वाली गतिविधियों से निपटने के लिए केंद्र सरकार को कुछ शक्तियां प्रदान की
  • मूल रूप से, अधिनियम आतंकवाद से संबंधित एक कानून नहीं था एवं 2004 में संशोधन के  पश्चात जब संसद ने आतंकवादी गतिविधियों को दंडित करने के लिए एक अध्याय समाविष्ट करने के पश्चात इस रूप में परिवर्तित हो गया।
  • बाद में, अधिनियम को इसके दायरे को व्यापक बनाने के लिए कई बार संशोधित किया गया था, अंतिम संशोधन 2019 में किया गया था जब न केवल कुछ समूहों को एक आतंकवादी संगठन के रूप में शामिल करने का निर्णय लिया गया था, बल्कि कुछ व्यक्तियों को भी आतंकवादी के रूप में इसमें  सम्मिलित करने का निर्णय लिया गया था।

 

गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए), 1967_50.1

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यूएपीए का महत्व

 

  • यह अधिनियम आतंकवाद के विरुद्ध भारत की विधायी नीति की नींव रखता है।
  • यह व्यक्तियों की सुरक्षा को अक्षुण्ण रखने के प्रति सरकार का उत्तरदायित्व सुनिश्चित करता है।
  • यह भारत की संप्रभुता और अखंडता को अनुरक्षित रखने में सहायता दूधिया करता है।
  • यह विधि प्रवर्तन एजेंसियों को आतंकवादियों से एक कदम आगे रखता है। इससे हमारे सुरक्षा बलों के मनोबल में वृद्धि होती है।

 

 

आलोचना

 

  • इस अधिनियम से जमानत कठिन हो जाती है। इसके अलावा, यह आरोप पत्र-पूर्व अभिरक्षा अवधि को 90 दिनों से बढ़ाकर 180 दिन करता है।
  • यह हमारे मुख्य मौलिक अधिकारों में से एक, अनुच्छेद 19 (1) (ए) के अंतर्गत प्रतिभूतित वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है।
  • इसमें अपराध स्थापन की दर कम है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, अधिनियम के अंतर्गत दर्ज मामलों में से केवल 2.2% मामलों में ही न्यायालयों ने दोष सिद्धि की है।
  • यह संघवाद को क्षीण करता है क्योंकि ‘पुलिस’ राज्य का विषय है और इस अधिनियम में एक राज्य पुलिस की सीमित भूमिका है।

 

समग्र शिक्षा योजना

 

 आगे की राह

 

  • इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए अधिनियम को अक्षरश: लागू किया जाना चाहिए।
  • बनाए रखने की आवश्यकता है व्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन। दोनों को सुनिश्चित करना भारत के लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है।
  • व्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के मध्य संतुलन स्थापित रखने की आवश्यकता है। दोनों को सुनिश्चित करना भारत के लोकतंत्र के लिए अनिवार्य शर्त है।
  • चूंकि मामला अधिनियम की व्याख्या का है, अतः न्यायपालिका की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। संवैधानिकता के चश्मे से स्वेच्छाचारिता और गुप्त प्रयोजनों  को निर्धारित किया जाना चाहिए। उदाहरण- गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने कहा कि विरोध से उत्पन्न नागरिक अशांति को आतंक का कार्य नहीं माना जा सकता है।

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