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The Editorial Analysis- India needs a renewed health-care system (Hindi)

संपादकीय विश्लेषण- भारत को एक नवीकृत स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की आवश्यकता 

 

प्रासंगिकता

  •         जीएस 2: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधन से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित मुद्दे।

 

The Editorial Analysis- India needs a renewed health-care system (Hindi)_40.1

 

http://bit.ly/2MNvT1m

प्रसंग

  •         हाल ही में हुए कैबिनेट फेरबदल में श्री मनसुख मंडाविया को हमारे देश का नया स्वास्थ्य मंत्री नियुक्त किया गया है। उन्हें पिछली गलतियों से सीखना चाहिए और सार्वजनिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर बेहतर प्रदर्शन करना चाहिए।

 

मुख्य बिंदु

  •         कोविड-19 ने हमें सिखाया है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे पर ध्यान क्यों दिया जाना चाहिए।
  •         जनसंख्या के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली कितनी महत्वपूर्ण है, इसे दो राज्यों: महाराष्ट्र और केरल की तुलना करके समझा जा सकता है ।
  •         वर्तमान में दोनों राज्यों में कोविड-19 के सर्वाधिक मामले हैं
  •         इसके अतिरिक्त, दोनों राज्यों का जीएसडीपी (सकल राज्य घरेलू उत्पाद) भी समान है।
  •         हालांकि, कोविड-19 से संबंधित मामलों में मृत्यु दर केरल में 0.48% और महाराष्ट्र में 2.04% थी।

 

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इस प्रकार के अंतर के कारण

  •         केरल में महाराष्ट्र की तुलना में प्रति व्यक्ति ढाई गुना अधिक सरकारी चिकित्सक और सरकारी अस्पतालों का अनुपात उतना ही अधिक है।
  •         सशक्त सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के परिणामस्वरूप प्रभावी अधिगम, समय पर परीक्षण, पूर्व अभिज्ञान और कोविड-19 रोगियों का अधिक तर्कसंगत उपचार हुआ।
  •       दूसरी ओर, महाराष्ट्र में एक वृहद निजी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र है किंतु सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली कमजोर है।

ये दो मामले हमें व्यापक पैमाने पर धन – जन की हानि से बचने के लिए अच्छी सार्वजनिक स्वास्थ्य  सेवा के महत्व  के बारे में आश्वस्त करते हैं।

 

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क्या किये जाने की आवश्यकता है?

  •         सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों को सुदृढ़ बनाना: ऑक्सीजन संयंत्रों को स्थापित करने की आवश्यकता है ताकि अस्पताल अपने स्वयं के ऑक्सीजन स्रोत प्राप्त कर सकें।
  •         राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता: 2017-18 से, एनएचएम के लिए आवंटन वास्तविक रूप से कम हो गया है, जिसके परिणामस्वरूप राज्यों को अपर्याप्त समर्थन और कोविड टीकाकरण में व्यवस्थागत अंतराल उत्पन्न हुआ है।
  •         राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन के लिए इस वर्ष 1,000 करोड़ रु.आवंटित किए गए हैं, जो प्रत्येक शहरी भारतीय के लिए 2 रुपये में  परिवर्तित हो जाता है। यह स्थिति बदलनी चाहिए और राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति द्वारा निर्धारित लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए संसदीय स्थायी समिति की सिफारिश के अनुसार 1.60 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए जाने चाहिए।
  •         निजी क्षेत्र का विनियमन करना: अस्पताल के विशालकाय बिलों ने केवल महामारी के कारण होने वाले संकट को बढ़ाया है। रेमडेसिवीर पैनिक ’अप्रमाणित प्रभावकारिता के बावजूद, अनियमित निजी अस्पतालों द्वारा इसके अति प्रयोग के साथ निकटता से जुड़ा हुआ था।
  •         नैदानिक ​​प्रतिष्ठान (पंजीकरण और विनियमन) अधिनियम लागू करना: यद्यपि अधिनियम 2010 में पारित किया गया था,  किंतु विभिन्न केंद्रीय मानकों को अधिसूचित करने में देरी के कारण इसे उचित प्रकार से लागू नहीं किया गया था।
  •         नीति आयोग ने ‘भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश के अवसर’ शीर्षक वाले अपने दस्तावेज में जिला अस्पतालों के निजीकरण का समर्थन किया है। हालांकि, यह प्रस्ताव भारत में निवास करने वाले ग्रामीण और निर्धन लोगों की बड़ी संख्या के कारण अनुक्रियाशील नहीं है। निजी अस्पतालों का विकास सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की कीमत पर नहीं होना चाहिए।

 

 आगे की राह

  •         सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा का उन्नयन करना आवश्यक है।
  •         कोविड-19 महामारी के दौरान जिस प्रकार से बाजार विफल हुआ, उसने हमें एक सबक सिखाया कि निजी क्षेत्र का विनियमन जनता के सर्वोत्तम हित में है।
  •         इसके आगे  स्वास्थ्य सेवा का निजीकरण समाप्त होना चाहिए क्योंकि इससे आम लोगों को  हानि होती है। 

 

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