न्यायाधीशों का अस्वीकरण_00.1
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न्यायाधीशों का अस्वीकरण

 

प्रासंगिकता

  • जीएस 2: विभिन्न अंगों, विवाद निवारण तंत्रों और संस्थानों के मध्य शक्तियों का पृथक्करण।

 

संदर्भ

  •  हाल ही में, दिल्ली उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने डिजिटल मीडिया घरानों की एक याचिका पर सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया, जिसने मध्यस्थों को विनियमित करने वाले आईटी विनियमों की वैधता को चुनौती दी थी।
  • यह कोई एकमात्र वाद नहीं है और कुछ दिन  पूर्व ही सर्वोच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों ने पश्चिम बंगाल से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया था।

 

न्यायाधीशों का अस्वीकरण: इसका क्या अर्थ है?

  • अस्वीकरण अथवा न्यायिक अनर्हता का अर्थ किसी न्यायालय के पीठासीन अधिकारी या एक प्रशासनिक अधिकारी द्वारा हितों के संघर्ष के कारण एक आधिकारिक कार्य में भाग लेने से  तटस्थ रहना है

 

अस्वीकरण के आधार

  • न्यायाधीश किसी वाद के वादी के पक्ष में पूर्वाग्रह रखता हो।
  • न्यायाधीश की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से विषय वस्तु में रुचि रखता हो।
  • न्यायाधीश को वाद के विषय में पूर्व अनुभव हो।
  • न्यायाधीश वादियों  से व्यक्तिगत रूप से  परिचित हो।

 

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संविधान क्या कहता है?

  • अनुच्छेद 14, अपनी विधि की सम्मत प्रक्रिया के अंतर्गत, कहता है कि कोई भी अपने मामले का एक न्यायाधीश नहीं हो सकता है। इस प्रमुख विशेषता के कारण, हितों के संघर्ष को अस्वीकरण के आधार के रूप में स्वीकार किया गया था।

 

अस्वीकरण की प्रक्रिया

  • अस्वीकरण का निर्णय, सामान्य तौर पर, स्वयं न्यायाधीश द्वारा लिया जाता है। कोई औपचारिक विधान नहीं है, जो अस्वीकरण की प्रक्रिया को परिभाषित  करता हो।
  • वाद से उत्पन्न होने वाले हितों का कोई संभावित टकराव है या नहीं, इसकी घोषणा करने का निर्णय न्यायाधीशों के  स्वविवेक पर छोड़ दिया गया है
  • जब कोई न्यायाधीश स्वयं को अलग करता है, तो वाद को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष एक नई पीठ को आवंटित करने के लिए सूचीबद्ध किया जाता है।

 

विधान परिषद: एक पूर्ण विश्लेषण

 

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पूर्व में लिए गए निर्णय

यद्यपि कोई औपचारिक नियम नहीं हैं,  फिर भी  सर्वोच्च न्यायालय के अनेक निर्णयों ने इस मुद्दे से निपटा है।

  • रंजीत ठाकुर बनाम भारत संघ (1987): इस वाद में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि पक्षपात की संभावना का परीक्षण वाद के पक्षकारों के मन में आशंका की तर्कसंगतता है।
  • 1999 का चार्टर ‘न्यायिक जीवन में मूल्यों का पुनर्स्थापन’ – सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपनाई गई आचार संहिता – में कहा गया है, “एक न्यायाधीश उस कंपनी में वाद की सुनवाई और निर्णय नहीं करेगा जिसमें वह शेयर धारिता रखता  हो … जब तक कि उसने अपनी अभिरुचि व्यक्त नहीं की है एवं उनके द्वारा सुनवाई और वाद का निर्णय देने में कोई आपत्ति नहीं है।”

 

न्यायाधीशों के अस्वीकरण से संबंधित मुद्दे

  • मामलों से न्यायाधीशों का बार-बार अलग होना न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर प्रश्न उठाता है, जो हमारे संविधान की एक आधारिक विशेषता है।
  • कभी-कभी पक्षकार सुझाव देते हैं कि न्यायाधीश को वाद से स्वयं को अलग कर लेना चाहिए। बिना किसी महत्वपूर्ण साक्ष्य  के न्यायाधीश ही का निर्णय करने का दृष्टांत एक खतरनाक प्रवृत्ति है।
  • यह पक्षकारों को अपनी पसंद के न्यायाधीशों के चयन की अनुमति प्रदान करता है।
  • नियम, जिसमें कहा गया है कि किसी को भी अपने मामले का न्यायाधीश नहीं होना चाहिए, विभिन्न निर्वचनों के अधीन है । हितों के संघर्ष वाले खंड का कई बार दुरुपयोग किया जाता है।
  • न्यायाधीशों द्वारा लिखित रूप में अस्वीकरण के कारणों को अभिलेखित नहीं किया जाता  है, जिससे अनुमान लगाने की बहुत गुंजाइश होती है।

 

आगे की राह 

  • 2015 में, न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ और न्यायमूर्ति मदन लोकुर ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को असंवैधानिक ठहराते हुए, न्यायाधीशों को  पारदर्शिता स्थापित करने एवं  प्रक्रिया संचालन हेतु नियमों के निर्माण  के लिए अस्वीकरण के कारणों को प्रकट करने  की आवश्यकता पर बल दिया।
  • न्याय वितरण को मार्ग निर्देशित करने के लिए अस्वीकरण  एक साधन नहीं बनना चाहिए।
  • न्यायिक पदाधिकारियों को समस्त दबावों का विरोध करना चाहिए, चाहे वे कहीं से भी आ रहे हों। हमारा संविधान उनसे यही अपेक्षा करता है।
  • इस मुद्दे से विशेष रूप से निपटने वाले सुस्पष्ट और विस्तृत नियमों की आवश्यकता है।

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