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वर्षा जल संचयन: जल के अभाव का प्रत्युत्तर

वर्षा जल संचयन: जल के अभाव का प्रत्युत्तर

 

वर्षा जल संचयन: जल के अभाव का प्रत्युत्तर_30.1

 

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प्रासंगिकता

 

  • जीएस पेपर 3: पर्यावरण- संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और अवक्रमण।

 

प्रसंग

  • भूजल स्तर में वृद्धि में उनका योगदान ज्ञात करने के लिए तालाब, एनीकट, रोधी बांधों, जोहड़और नाड़ियों सहित राजस्थान के गांवों में वर्षा जल संचयन संरचनाओं का अध्ययन किया जाएगा।

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वर्षा जल संचयन के बारे में

  • परिभाषा: वर्षा जल संचयन वर्षा जल का संग्रहण और भंडारण है जो छतों के ऊपर, खुले स्थानों जैसे पार्कों और सड़कों या विशेष रूप से निर्मित तलों से प्रवाहित होता है।
  • पारंपरिक वर्षा जल संचयन विधियाँ: देश भर में वर्षा के प्रतिरूप में अस्थायी और स्थानिक भिन्नता के कारण,  जल के संरक्षण और भंडारण के लिए प्राचीन काल से  अनेक पारंपरिक पद्धति विकसित की गई हैं। इनमें से कुछ हैं:
    • कर्नाटक में टैंक: ये गर्तों का लाभ उठाकर जल को एकत्रित करने हेतु निर्मित कृत्रिम जलाशय हैं।
    • ज़िंग-टैंक: लद्दाख में द्रवीभूत हिम से जल एकत्रित करने  हेतु।
    • बावड़ी: ये राजस्थान और गुजरात में पाए जाते हैं।
    • बावड़ियां / बेर – ये राजस्थान में मिलने वाले सामुदायिक कुएँ हैं।
    • अपातानीअरुणाचल प्रदेश में अन्तर्गमन और बहिर्गमन वाहिकाओं से संबद्ध सीढ़ीदार भूभाग।
    • पाइन-आहर: दक्षिण बिहार की प्रणाली जिस पर धान की खेती निर्भर करती है।
    • कुल्स:  प्रायः लंबी दूरी तक  विस्तृत, कुछ 10 किमी से अधिक लंबे, कुल्स सदियों से उपस्थित हैं। ये जम्मू, हिमाचल प्रदेश  के पर्वतीय क्षेत्रों में अवस्थित हैं।
    • टंका प्रणाली: इसका उपयोग राजस्थान में किया जाता है, जो एक बेलनाकार जमीन का गड्ढा है जो पास के जलग्रहण क्षेत्र से वर्षा जल प्राप्त करता है।
    • बाँस की ड्रिप सिंचाई: उत्तर पूर्व में उपयोग की जाती है, पहाड़ी इलाकों में सिंचाई हेतु उपयुक्त है।

 

वर्षा जल संचयन (आरडब्ल्यूएच) प्रणालियों की आवश्यकता

  • जल के अभाव का मुकाबला करने  हेतु: 2018 में नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, 21 प्रमुख शहर 2020 तक शून्य भूजल स्तर तक पहुंचने के लिए गतिमान हैं, जिससे 100 मिलियन  व्यक्तियों के लिए अधिगम  प्रभावित हो रहा है।
    • आरडब्ल्यूएच के माध्यम से एकत्र किए गए जल का उपयोग भूजल के संभरण के लिए किया जा सकता है, जो कि जलभृतों से निकाले गए जल की पुनः पूर्ति कर रहा है।
    • अतः, विशाल भारतीय  जनसंख्या की बढ़ती  आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए वर्षा जल का प्रभावी  रूप से उपयोग करने  हेतु आरडब्ल्यूएच एक स्थायी और विश्वसनीय पद्धति है।
  • द्रुत  नगरीकरण और औद्योगीकरण: सार्वजनिक जलापूर्ति के बुनियादी ढांचे को पहले से ही खराब होने से स्वच्छ जल की आपूर्ति की अधिक आवश्यकता होगी।
    • समुदाय के सहयोग से आरडब्ल्यूएच तकनीकों के प्रभावी कार्यान्वयन के माध्यम से इस समस्या का समाधान किया जा सकता है।
    • रूफटॉप आरडब्ल्यूएच तकनीक इस संबंध में, जहां वर्षा जल को छत के जलग्रहण क्षेत्रों से एकत्र किया जाता है और जलाशयों में संग्रहित किया जाता है।
  • कृषि क्षेत्र की सिंचाई की आवश्यकताओं को पूर्ण करने हेतु: चूंकि भारत के कुल बोए गए क्षेत्र का 60% असिंचित है (भारत के शुष्क क्षेत्र में सूखे के बढ़ते मामले) अर्थात वर्षा पर निर्भर है। भारत में, अधिकांश वर्षा मानसून  के ऋतु में होती है, जिससे किसान अन्य ऋतुओं में असुरक्षित हो जाते हैं।
    • आरडब्ल्यूएच किसानों की सिंचाई आवश्यकताओं  हेतु नियमित जल आपूर्ति  उपलब्ध कराने में सहायता कर सकता है। इससे  दीर्घ अवधि में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी।
    • इस जल का उपयोग पीने ( उपचारित किए जाने के पश्चात), घरेलू उपयोग तथा पशुओं के लिए विभिन्न उद्देश्यों के लिए भी किया जा सकता है।
  • अपवाह हानि को कम करने हेतु: भारत में  तीन चौथाई से अधिक वर्षा 4 महीने (मानसून) के दौरान होती है। जिसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा अपवाह और वाष्पीकरण में लुप्त हो जाता है, इसे वर्षा जल संचयन द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है।

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वर्षा जल संचयन के लाभ

  • बाढ़ तथा सूखे जैसी आपदाओं का सामना करना: क्योंकि यह मानसून ऋतु में जल का भंडारण करता है जो बाढ़ की संभावना को कम करता है और सूखे के दौरान समुदाय को प्रतिकूल परिस्थितियों से सुरक्षित रखता है।
  • भूजल पुनर्भरण के लिए विश्वसनीय और सस्ता तंत्र: क्योंकि इसमें भंडारण के उद्देश्य से कोई भूमि व्यर्थ नहीं होती है और कोई जनसंख्या विस्थापन भी नहीं होता है। भूमिगत जल  प्रत्यक्ष रूप से वाष्पीकरण और प्रदूषण के संपर्क में नहीं आता है।
  • मृदा के अपरदन को कम करता है: क्योंकि यह वर्षा जल के निर्बाध प्रवाह को रोकता है। मृदा  के अपरदन को कम करने और  मृदा के पोषक तत्वों की हानि को कम करने के लिए रोधी बांध  जैसी पद्धतियां अत्यंत प्रभावशाली हैं।
  • शहरी क्षेत्रों में भूमिगत संग्रहित जल भी घरेलू  आवश्यकताओं के लिए उपचारित किए जाने के पश्चात जलापूर्ति के लिए एक किफायती पद्धति है।

 

भारत में वर्षा जल संचयन से जुड़ी चुनौतियाँ

  • सामुदायिक सहभागिता का अभाव: सरकारें  प्रायः आरडब्ल्यूएच नीतियां निर्मित और क्रियान्वित करते समय स्थानीय सहभागिता एवं आवश्यकताओं की अनदेखी करती हैं। इसका परिणाम अपर्याप्त कार्यान्वयन और वास्तविकता में किसी महत्वपूर्ण परिवर्तन का अभाव है।
    • उदाहरण के लिए, दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे महानगरों में जल संचयन से संबंधित कानून   अस्तित्व में हैं  किंतु केवल कागजों पर।
  • निजी क्षेत्र की सहभागिता का अभाव: यह मुख्य रूप से आरडब्ल्यूएच प्रणालियों के निर्माण  तथा अनुरक्षण में निजी   सहभागिता हेतु सरकार द्वारा स्पष्ट दिशा-निर्देशों और ढांचे की कमी के कारण है।
  • आरडब्ल्यूएच संरचनाओं के निर्माण और अनुरक्षण हेतु सरकार द्वारा समुदाय को वित्तीय और तकनीकी सहायता का अभाव
  • न्यून साक्षरता और जल संरक्षण के बारे में जागरूकता: इससे न केवल जल व्यर्थ होता है बल्कि आरडब्ल्यूएच जैसे जल संरक्षण पद्धतियों की भी उपेक्षा होती है। कई बार यह जल संरक्षण के लिए अनेक अच्छी सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों की विफलता का प्रमुख कारण बन जाता है।

 

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आगे की राह

  • व्यापक जागरूकता अभियान सुनिश्चित करना: सामान्य रूप से जल संरक्षण और विशेष रूप से आरडब्ल्यूएच जैसे जल संरक्षण पद्धतियों की दिशा में।जन भागीदारीके माध्यम से आरडब्ल्यूएच को जन आंदोलनबनाना भारत के लिए सतत जल उपयोग और भविष्य सुनिश्चित करने में एक लंबा रास्ता तय करेगा।
    • जल शक्ति मंत्रालय के राष्ट्रीय जल मिशन के अंतर्गत कैच द रेनजागरूकता उत्पत्ति अभियान सही दिशा में एक कदम है।
  • सरकार को संपूर्ण देश में आरडब्ल्यूएच संरचनाओं के निर्माण के लिए प्रोत्साहन और संभारिकी सहायता प्रदान करनी चाहिए।
    • चूंकि आरडब्ल्यूएच न केवल जल प्रबंधन का सर्वाधिक धारणीय एवं दक्ष मार्ग प्रदान करता है बल्कि कई अन्य आर्थिक गतिविधियों  के परिदृश्य भी खोलता है जिससे जमीनी स्तर पर लोगों का सशक्तिकरण होता है।

 

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