राज्यपाल का पद: मुद्दे एवं चुनौतियां_00.1
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राज्यपाल का पद: मुद्दे एवं चुनौतियां

प्रासंगिकता

  • जीएस पेपर 2 :

–        भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकासक्रम, विशेषताएं, संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान एवं मूल संरचना।

–        संघवाद- संघीय ढांचे से संबंधित मुद्दे एवं चुनौतियाँ।

 

प्रसंग

 

  •         राज्यों के कई राज्यपालों के संदिग्ध आचरण ने उनके कार्यों के संवैधानिक औचित्य पर पुनः प्रश्न उठा दिया है।
  •         उनकी संवैधानिक भूमिका के निष्पादन के बजाय, केंद्र सरकार के हाथों की कठपुतली होने के लिए प्रायः उनकी आलोचना की जाती है।

 

राज्यपाल के बारे में महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान

  •         पृष्ठभूमि: राज्यपाल का पद भारत सरकार अधिनियम 1935 से आहरित है।उनकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

–        ब्रिटिश भारत की सरकार के विपरीत, राज्यपाल एक राज्य का संज्ञात्मक प्रमुख होते हैं। केंद्र में राष्ट्रपति की भांति, उनसे कुछ संवैधानिक एवं परिस्थितिजन्य विवेकाधिकार को छोड़कर, राज्य के मंत्रिपरिषद (सीओएम) सहायता एवं परामर्श पर कार्य करने की अपेक्षा की जाती है।

  •         अनुच्छेद 163: यह राज्यपाल की समस्त विवेकाधीन शक्तियों का स्रोत है, जिसके परिणामस्वरूप निर्वाचित राज्यकार्यपालिका एवं विधायिका के साथ संघर्ष होता है।
  •         अनुच्छेद 153: प्रत्येक राज्य या दो या अधिक राज्यों के लिए एक राज्यपाल होंगे
  •         अनुच्छेद 256: संघ की कार्यकारी शक्ति का विस्तार किसी राज्य को ऐसे निर्देश देने तक होगा जो भारत सरकार को उस उद्देश्य के लिए आवश्यक प्रतीत हो।
  •         आपातकालीन शक्तियां (अनुच्छेद 356): राज्यपाल राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता के आधार पर राज्य में आपातकाल लगाने की संस्तुति कर सकते हैं एवं भारत के राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त करने के पश्चात उद्घोषणा जारी कर सकते हैं।
  •         राज्यों एवं केंद्र सरकार के मध्य एक सेतु के रूप में कार्य करते हैं: संविधान निर्माताओं ने राज्यपाल को केंद्र एवं राज्यों केमध्य एक साझा कड़ी होने की कल्पना की, जो राज्य में लोकतांत्रिक सरकार के सुचारू कामकाज को सुनिश्चित करता है।

 

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राज्यपाल के पद से जुड़े मुद्दे

  •         नियुक्ति/हटाने की प्रक्रिया: राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं क्योंकि संविधान में पदच्युति हेतु कोई आधार उल्लेखित नहीं है।

–        यह नियुक्ति प्रक्रिया में पक्षपात को अग्रसर करता है एवं कम सक्षम व्यक्तियों के पक्ष में उपयुक्त उम्मीदवारों की उपेक्षा की जाती है।

  •         केंद्र में राजनीतिक दल के अभिकर्ता के रूप में कार्य करना: नियुक्ति में पक्षपात एवं संविधान में कार्यकाल की किसी भी सुरक्षा के अभाव के कारण, राज्यपाल कापद राज्य एवं केंद्र सरकारके मध्य एक सेतु के रूप में कार्य करने के बजाय प्रायः केंद्र सरकार के कठपुतली / अभिकर्ता के रूप में कार्य करता है।
  •         विवेकाधीन शक्तियां:

–        त्रिशंकु विधानसभाओं में पक्षपातपूर्ण भूमिका: यह एक परिस्थितिजन्य विवेकाधिकार है जहां वह सरकार बनाने के लिए किसी दल / गठबंधन को आमंत्रित करने के लिए स्वतंत्र है, यदि राज्य विधानसभा चुनावों में किसी भी दल / निर्वाचन पूर्व गठबंधन ने बहुमत सीटें नहीं जीती हैं।

उदाहरण: कर्नाटक, जहां राज्यपाल ने निर्वाचन उपरांत गठबंधन के नेता को आमंत्रित करने के बजाय, सरकार बनाने के लिए सबसे बड़े दल को आमंत्रित किया, जिसने चुनावों में बहुमत सीटें जीती थीं।

–        राष्ट्रपति के विचार हेतु किसी विधेयक को आरक्षित करने की शक्ति का दुरुपयोग: राष्ट्रपति के विचार के लिए कुछ राज्य विधेयकों को आरक्षित करना उनका संवैधानिक विवेकाधिकार है। इस शक्ति का दुरुपयोग करते हुए, राज्यपाल प्रायः राज्य विधानसभा के विधान निर्माण की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करते हैं, विशेष रूप से उन विधेयकों के लिए जो केंद्र सरकार के लिए असहज हैं।

  •         आपातकालीन शक्तियों का दुरुपयोग: राज्यपालों को अक्सर तुच्छ आधारों पर राज्य में राष्ट्रपति शासन आरोपित करने की सिफारिश करते पाया गया है, विशेष रूप से, जब केंद्र में सत्तारूढ़ दल संबंधित राज्य से भिन्न होता है।
  •         निर्वाचित सरकार का वर्जन करना: ऐसे कई उदाहरण हैं जब राज्यपाल राज्य के अधिकारियों को सीधे आदेश देते हैं या राज्य सरकारों को सूचित किए बिना सार्वजनिक कार्यालयों का दौरा करते हैं। यह उनके संवैधानिक जनादेश के विरुद्ध है क्योंकि वह केवल एक नाममात्र के प्रमुख हैं एवं उनसे राज्य मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करने की अपेक्षा की जाती है।

राज्यपाल का पद: मुद्दे एवं चुनौतियां_50.1

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सुझाव

  •         एस. आर. बोम्मई के फैसले को अक्षरश: लागू करना: जो सर्वोच्च न्यायालय को दुर्भावनापूर्ण एवं अनुचित होने के आधार पर राज्य में आपातकाल आरोपित करने की जांच करने की अनुमति प्रदान करता है।
  •         राज्यपालों की नियुक्ति एवं पदच्युति के लिए एक ठोस प्रक्रिया विकसित करना: जैसा कि पुछी एवं सरकारिया आयोगों ने सुझाव दिया है, राज्यपालों को स्वच्छ चरित्र एवं गुणवत्ता के आधार पर चयनित किया जाना चाहिए एवं उन्हें निश्चित कार्यकाल प्रदान किया जाना चाहिए।
  •       सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों एवं क्षेत्र के अन्य संवैधानिक विशेषज्ञों के साथ संघ एवं राज्य सरकारों के पूर्व परामर्श एवं समझौते के साथ राज्यपाल के पद के लिए एक आचार संहिता विकसित करें
  •         संवैधानिक सिद्धांतों को अक्षुण्ण रखना: राज्यपालों को केंद्र में सत्तारूढ़ दल के संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए कार्य करने के बजाय, संविधान की भावना को बनाए रखते हुए संवैधानिक नैतिकता को अक्षुण्ण रखना चाहिए।

 

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