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भारत के जनसांख्यिकीय अवसर और महिलाओं के समक्ष आने वाले मुद्दे

प्रासंगिकता

  • जीएस पेपर 2: शासन, प्रशासन और चुनौतियां- सामाजिक क्षेत्र/मानव संसाधन से संबंधित सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित मुद्दे।

भारत के जनसांख्यिकीय अवसर और महिलाओं के समक्ष आने वाले मुद्दे_30.1

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प्रसंग

  • कोविड-19 महामारी केइस कठिन समय में, 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस कुछ सकारात्मक खबरें लेकर आया है – भारत एक जनसांख्यिकीय सुखद बिंदु में प्रवेश कर गया है जो अगले दो से तीन दशकों तक जारी रहेगा।
  • आर्थिक विकास और सामाजिक प्रगति के संचालक: क्योंकि भारत की आधी से अधिक जनसंख्या 29 वर्ष से कम आयु की है।
  • यौन और प्रजनन स्वास्थ्य और अधिकार (एसआरएचआर) (गुट्टमैकर-लांसेट आयोग द्वारा परिभाषित): इसमें हिंसा, कलंक और शारीरिक स्वायत्तता के लिए सम्मान जैसे मुद्दे शामिल हैं, जो एसआरएचआर के साथ-साथ व्यक्तियों के मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक और सामाजिक कल्याण को बहुत प्रभावित करते हैं।

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भारत की जनसांख्यिकी: उपलब्धियां

  • जनसंख्या का स्थिरीकरण: कुल प्रजनन दर (टीएफआर) (वर्तमान में 2.2 बच्चों पर) में गिरावट के कारण, जोशीघ्र ही प्रतिस्थापन स्तर (2.1) तक पहुंच जाएगा।

o किंतु ‘जनसंख्या संवेग’ प्रभाव के कारण भारतीय जनसंख्या में वृद्धि जारी रहेगी।

o जनसंख्या संवेग: तब  घटित होता है जब किसी देश की प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर तक या उससे कम हो जाती है,  तथापि जनसंख्या की आयु संरचना के कारण जनसंख्या के आकार में वृद्धि होती रहती है।

  • संस्थागत प्रसव की संशोधित दर और मातृ मृत्यु अनुपात (एमएमआर): में गिरावट प्रतिदर्श पंजीकरण प्रणाली (एसआरएस) के आंकड़ों के अनुसार, एमएमआर 1999-2001 में 327 से घटकर 2016-18 में प्रति 100,000 जीवित जन्मों पर 113 हो गया है।
  • बेहतर परिवार नियोजन: उदाहरण के लिए, अधिकांश राज्यों में गर्भनिरोधक प्रसार में सुधार हुआ है (वर्ष 2019-20 के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य परिवार सर्वेक्षण 5)।

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महिलाओं के समक्ष चुनौतियां:

  • ग्रामीण-शहरी विभाजन: चूंकि ग्रामीण महिलाओं में टीएफआर राष्ट्रीय औसत 2.2 बच्चों से अधिक है।

o यह औपचारिक शिक्षा  के अभाव एवं निर्धनता के कारण है, क्योंकि उनमें से  अधिकांशतः निर्धन राज्यों में रहते हैं।

  • एसआरएचआर तक सीमित पहुंच: व्यापक नकारात्मक सामाजिक मानदंडों, स्वास्थ्य प्रणाली की बाधाओं और लैंगिक असमानता के कारण।
  • एसआरएच सेवाओं की अपर्याप्त सूचना एवं अभिगम:

o प्रत्येक वर्ष दो मिलियन किशोरियां (15-19 वर्ष)  गर्भवती होती थींं, और इनमें से लगभग 63% अवांछित या अनभिप्रेत थीं (गुट्टमैकर इंस्टीट्यूट, 2021)।

o एनएफएचएस-4 के अनुसार, 22.2% किशोरियों की गर्भनिरोधक की आवश्यकता पूरी नहीं हुई।

  • महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता का अस्वीकरण: सामाजिक रूप से स्वीकृत हानिकारक प्रथाएं जैसे बाल विवाह, लिंग आधारित हिंसा प्रायः सामाजिक मानदंडों, विश्वासों और प्रथाओं में निहित होती हैं।

o उदाहरण के लिए, 20-24 वर्ष की आयु की 26.8% महिलाओं का विवाह 18  वर्ष की उम्र से पूर्व ही हो जाता है,  प्रायः उनकी प्रथम संतान विवाह के प्रथम साल के भीतर  होती है।

  • द वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) वैश्विक लैंगिक अंतराल रिपोर्ट (2021) परनिराशाजनक प्रदर्शन: भारत 156 देशों में 28 स्थान नीचे गिरकर 140वें स्थान पर आ गया है, जो दक्षिण एशिया में तीसरा सर्वाधिक निराशाजनक प्रदर्शन करने वाला देश बन गया है।

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आगे की राह 

  • सरकार को करना चाहिए –

o सुनिश्चित करे कि देश के युवा स्वस्थ, भिज्ञ और कुशल हैं।

o युवाओं को उनकी पूर्ण क्षमता के विकास के लिए अधिकार और विकल्प प्रदान करे, जिसमें विशेष रूप से यौन और प्रजनन स्वास्थ्य और अधिकार (एसआरएचआर) सम्मिलित हैं।

o सकारात्मक वृत्ताकार प्रवाह प्रभाव को प्रेरित करना: युवाओं, महिलाओं और  बालिकाओं को नीति निर्धारण और सेवाओं के केंद्र में रखकर।

  • यौन और प्रजनन स्वास्थ्य (एसआरएच) सेवाओं के लिए पर्याप्त प्रावधान सुनिश्चित करे: क्योंकि किसी भी अन्य विलंब से महिलाओं औरबालिकाओं के स्वास्थ्य और कल्याण में कमी आएगी, जिसके परिणाम आजीवन रह सकते हैं।
  • सहयोगात्मक दृष्टिकोण: समाज के सभी वर्गों को सकारात्मक बदलाव के लिए इस आह्वान को स्वीकार करना चाहिए, प्रत्येक व्यक्ति से लेकर संस्था स्तर तक अपनी भूमिका अदा कर रहे हैं।
  • सामाजिक कल्याण में निवेश आर्थिक प्रगति के साथ-साथ होना चाहिए: जैसा कि बेटी बचाओ बेटी पढाओ (बीबीबीपी) जैसे कार्यक्रमों की सफलता से प्रकाशित होता है।
  • महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता सुनिश्चित करना: जिसके परिणामस्वरूप उनके स्वास्थ्य, शिक्षा, आय और सुरक्षा में प्रगति होगी। उनके एवं इसी प्रकार उनके परिवार के भी उन्नति करते की अधिक संभावना है।

 

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