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मात्स्यिकी सहायिकी

मात्स्यिकी सहायिकी

मात्स्यिकी सहायिकी_40.1

 

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प्रासंगिकता

  •         जीएस 3: प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कृषि सहायिकी से संबंधित मुद्दे

 

प्रसंग

  • जिनेवा में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में व्यापार मंत्रियों की एक प्रमुख बैठक ज़ारी है, जहां वैश्विक मत्स्य भंडार में गिरावट के मामले पर वार्ता चल रही है, जिसे सरकारी सहायिकी द्वारा भी प्रोत्साहित किया जाता है।

 

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मुख्य बिंदु

  • वार्ता प्रथम बार 2001 में दोहा मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में  आरंभ हुई थी।
  • 2005 में हॉन्ग कॉन्ग की बैठक में अधिदेश आज्ञा का और विस्तार किया गया था, जिसमें कतिपय प्रकार की मात्स्यिकी सहायिकी को प्रतिबंधित करने का आह्वान भी शामिल था जो अधिक्षमता और अतिमत्स्यन में योगदान करते हैं।
  • 2017 में ब्यूनस आयर्स में आयोजित विश्व व्यापार संगठन के 11वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में, वार्ताकारों को अवैध, गैर-सूचित और अनियमित मत्स्यन हेतु सहायिकी को समाप्त करने के तरीके खोजने का कार्य सौंपा गया था।
  • इसका उद्देश्य कतिपय निश्चित प्रकार की मात्स्यिकी सहायिकी को प्रतिबंधित करने के लिए समझौते करना भी था जो अधिक्षमता और अतिमत्स्यन में योगदान करते हैं।
  • प्रस्ताव विशेष आर्थिक क्षेत्रों (ईईजेड) में मत्स्यन के लिए सहायिकी को प्रतिबंधित करने और क्षेत्रीय जल में मत्स्यन गतिविधियों को पूर्ण रूप से छूट प्रदान करने का है, जिसे समुद्र तट से 12 समुद्री मील के रूप में माना जाता है।

 

सहायिकी प्रतिषेध के कारण

  • संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) की एक रिपोर्ट के अनुसार, अत्यधिक दोहन के कारण विश्व के  मत्स्य पारिस्थितिकी तंत्र के पतन का संकट है।
  • उपरोक्त समस्या के प्रमुख कारणों में से एक, विश्व भर में प्रत्येक वर्ष सरकारों द्वारा प्रदान की जाने वाली भारी सहायिकी है, जो व्यापक पैमाने पर संचालित मत्स्यन को लाभ पहुंचाती है जबकि  छोटे पैमाने पर संचालित मत्स्यन के साथ भेदभाव करती है।

 

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भारत में मत्स्य पालन का महत्व

  • मत्स्य पालन क्षेत्र प्राथमिक स्तर पर लगभग 16 मिलियन मत्स्य पालकों को आजीविका उपलब्ध कराता है, इसके  अतिरिक्त मूल्य श्रृंखला में अत्यधिक योगदान देता है।
  • कुल सकल घरेलू उत्पाद (वर्तमान मूल्यों पर) में मत्स्य पालन क्षेत्र का हिस्सा 1950-51 में 0.40 प्रतिशत से बढ़कर 2017-18 में 1.03 प्रतिशत हो गया।
  • भारत वैश्विक प्रग्रहण मत्स्य पालन के शीर्ष सात उत्पादक देशों में सम्मिलित है, जो कुल प्रग्रहण का लगभग 50% हिस्सा है।

 

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भारत का दृष्टिकोण

  • जब अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देश मात्स्यिकी सहायिकी के पूर्ण प्रतिबंध पर बल दे रहे हैं, भारत कुछ विकासशील देशों के साथ न्यायसंगत और संतुलित परिणाम के लिए तर्क दे रहा है।
  • ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारा देश अपने छोटे और सीमांत मत्स्य पालकों को सहायता प्रदान करता है जो जीविका के लिए इस क्षेत्र पर निर्भर हैं।
  • ऐसा उपाय राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा के लिए अहितकर सिद्ध होगा।
  • भारत का यह भी तर्क है कि इस तरह के उपचार विकासशील देशों के विशेष और विभेदक उपचार अधिकारों को कमजोर करने के समान होंगे – एक प्रावधान जो इन समझौतों को लागू करने के लिए विकासशील देशों को  लोच शीलता प्रदान करता है।
  • कुछ विकसित देशों के विपरीत, जो अपने मत्स्य पालकों को अरबों डॉलर की सहायिकी  प्रदान करते हैं, भारत की सहायिकी मात्र लगभग 770 करोड़ रुपये है – वह भी ईंधन और नावों जैसी वस्तुओं के लिए।
  • भारत सरकार-से-सरकार अधिगम समझौते गढ़ने के विकसित देशों के प्रस्ताव का विरोध करेगा जिसमें दो देश मत्स्यन की गतिविधियों के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर कर सकते हैं। भारत ऐसे समझौतों की आलोचना करता है क्योंकि ये अल्प विकसित देशों के शोषण की ओर अग्रसर करेंगे।
  • भारत का यह भी विचार है कि विकसित देशों को भारी मात्रा में सहायिकी के लिए अधिक उत्तरदायित्व ग्रहण करना चाहिए और अतिमत्स्यन को कम करने के लिए इसमें कमी करनी चाहिए।

 

 आगे की राह

  • वास्तविकता में सहायिकी व्यापार विकृतियों की ओर अग्रसर नहीं करती हैं। खाद्य सुरक्षा के लिए सहायिकी को निर्यात के लिए सहायिकी की तुलना में  पृथक रूप से व्यवहार करने की आवश्यकता है।

 

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