भारत से निर्यात_00.1
UPSC Exam   »   भारत से निर्यात

भारत से निर्यात

प्रासंगिकता

  • जीएस पेपर 3: भारतीय अर्थव्यवस्था: योजना, संसाधनों का अभिनियोजन, वृद्धि, विकास एवं रोजगार से संबंधित मुद्दे।

 

प्रसंग

 

  • भारत ने 2021-22 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) के दौरान 95 अरब डॉलर का उच्चतम त्रैमासिक व्यापारिक निर्यात दर्ज किया है, जो जनवरी-मार्च 2020 में 90 अरब डॉलर के पिछले रिकॉर्ड को पार कर गया है।
  • सरकार का लक्ष्य वित्त वर्ष 22 में 400 अरब डॉलर के व्यापारिक निर्यात का लक्ष्य प्राप्त करना है।

 

भारतीय निर्यात: प्रवृत्ति एवं विश्लेषण

 

  • वैश्विक हिस्सेदारी: वैश्विक स्तर पर 13वें स्थान पर, भारत की वस्तुओं एवं सेवाओं के विश्व निर्यात में 2.2% की हिस्सेदारी – चीन का लगभग पांचवां (10.6%) है।
    • भारत का जीडीपी अनुपात व्यापार 2008 के बाद से चीन से अधिक हो गया है, लेकिन हमारा आयात निर्यात से काफी अधिक है।
    • भारत का सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में व्यापार 2008 के बाद से चीन से अधिक हो गया है, किंतु हमारा आयात निर्यात से काफी अधिक है।
  • सकल घरेलू उत्पाद के % के रूप में निर्यात: जीडीपी में भारत के वस्तुओं एवं सेवाओं के निर्यात की हिस्सेदारी 2011 में 24.5% से घटकर 2019 में 18.7% हो गई है।
  • भारत में पारंपरिक रूप से पण्य में व्यापार घाटा एवं सेवाओं में व्यापार अधिशेष है।
  • सरकार का लक्ष्य: वित्त वर्ष 23 के लिए व्यापारिक निर्यात का लक्ष्य 500 अरब डॉलर एवं अगले पांच वर्षों में 1 ट्रिलियन डॉलर का है।

भारत से निर्यात_50.1

 

भारत को निर्यात पर ध्यान क्यों देना चाहिए?

 

  • रोजगार, आय वृद्धि एवं मांग आधारित औद्योगिक विकास का एक अच्छा चक्र निर्मित करता है: क्योंकि निर्यात घरेलू विनिर्माण आधारित रोजगार एवं प्रति व्यक्ति आय को गति प्रदान करेगा। इससे प्रयोज्य आय में वृद्धि होगी जिसके परिणामस्वरूप मांग संचालित आर्थिक विकास होगा।
  • निर्यात एवं आर्थिक विकास:
    • 1991 से पूर्व, 3.5% की वृद्धि दर लगभग 4.5% की निर्यात वृद्धि से संबद्ध थी
    • यद्यपि, 1991 के पश्चात भारत की 6% से अधिक की जीडीपी वृद्धि लगभग 11% की वास्तविक निर्यात वृद्धि से संबद्ध थी।
  • समुन्नत सार्वभौम साख निर्धारण: निर्यात वृद्धि भारत के व्यापार घाटे को कम करने में सहायता करेगी, साख निर्धारण एजेंसियों को भारत के साथ निर्धारण में सुधार करने के लिए प्रेरित करेगी जिसके परिणामस्वरूप कम ब्याज ऋण एवं आर्थिक विकास होगा।

 

भारतीय निर्यात पारिस्थितिकी तंत्र की चुनौतियां

 

  • घरेलू उपभोग आधारित विकास प्रतिरूप पर सरकार का फोकस:
    • प्रति व्यक्ति आय में अल्प वृद्धि: वस्तुओं एवं सेवाओंके उपभोग को सीमित कर देगी।
    • कोविड19प्रभाव: के परिणामस्वरूप, अल्प सार्वजनिक व्यय, कर में कटौती, निजी निवेश, आदि घरेलू मांग आधारित वृद्धि की परिधि सीमित हो गई।
  • वैश्विक मूल्य आपूर्ति श्रृंखलाओं (जीवीसी) से पृथक पूर्व एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रमुख निर्यातक देशों के विपरीत, भारत जीवीसी के साथ असंतोषजनक रूप से संबद्ध है। यह इसकी निर्यात क्षमता को सीमित करता है।
    • इसका परिणाम उच्च आय वाले देशों में निम्न अंतर्वेशन है।
  • सीमित निर्यात गंतव्यों पर ध्यान केंद्रित होना: इसके परिणामस्वरूप उच्च प्रतिस्पर्धा एवं कम विकास के अवसर प्राप्त होते हैं।
  • असंतोषजनक घरेलू आधारिक अवसंरचना एवं स्पष्ट नीति निर्देशन: उदाहरण के लिए, भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद का 14% से अधिक सम्भारिकी पर व्यय करता है, जिसके परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए उत्पाद महंगे होते हैं, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धा कम हो जाती है।
  • जागरूकता का अभाव: भारत में व्यक्तियों के मध्य सूचना का अंतराल है, जिसके परिणामस्वरूप निर्यात बाजार में कम लोग भाग लेते हैं।
  • व्यापार में तकनीकी बाधाएं: कई विकसित देशों द्वारा भारत से निर्यात को अस्वीकार करने के लिए लगाया गया। उदाहरण के लिए, विभिन्न भारतीय सामानों को अस्वीकार करने के लिए यूरोपीय संघ के देशों द्वारा स्वच्छता एवं पादप स्वच्छता उपायों का उपयोग।
  • भारत से निर्यात को अस्वीकार करने के लिए कई विकसित देशों द्वारा व्यापार में तकनीकी बाधाएं आरोपित की गई। उदाहरण के लिए, विभिन्न भारतीय वस्तुओं को अस्वीकार करने के लिए यूरोपीय संघ के देशों द्वारा स्वच्छता विषयक एवं पादप स्वच्छता पद्धतियों का उपयोग किया गया ।

भारत से निर्यात_60.1

 

 आगे की राह

 

  • निर्यात फोकस निम्न पर होना चाहिए
    • उच्च क्षमता वाले विनिर्माण क्षेत्र: यथा, इलेक्ट्रॉनिक्स, परिधान, औषध, एवं
    • आईसीटी, स्वास्थ्य सेवा, एवं व्यापार तथा पेशेवर सेवाओं में उच्च मूल्य सेवाएं
    • कुछ उत्पादों में विशेषज्ञता के परिणामस्वरूप उन भारतीय उत्पादों के लिए प्रतिस्पर्धात्मक लाभ प्राप्त होगा।
  • कुछ गंतव्यों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय विश्व भर के देशों में निर्यात बाजारों का विविधीकरण।
    • सरकार किसी विशेष आयातक देश द्वारा मांग की जाने वाली संभावित वस्तुओं एवं सेवाओं की सूची तैयार करके निर्यातकों की सहायता कर सकती है।
  • घरेलूआधारिक अवसंरचना में सुधार के परिणामस्वरूप दूरस्थ स्थानों एवं बंदरगाहों एवं हवाई अड्डों केमध्य बेहतर संपर्कस्थापित होगा, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सम्भारिकी लागत तथा प्रतिस्पर्धी उत्पादों में कमी आएगी।

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