Crafting a unique partnership with Africa (Hindi)_00.1
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Crafting a unique partnership with Africa (Hindi)

       अफ्रीका के साथ एक विशिष्ट साझेदारी का निर्माण

 

स्रोत: https://www.thehindu.com/opinion/op-ed/crafting-a-unique-partnership-with-africa/article35157179.ece

 

प्रासंगिकता

  •         जीएस पेपर 2: अंतर्राष्ट्रीय संबंध: द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और भारत से संबंधित एवं / अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले समझौते।

 

संदर्भ

जैसा कि भारतीय-अफ्रीकी संबंध महामारी के प्रांत के विश्व में प्रवेश कर रहा है, कृषि में साझेदारी बढ़ाने में संसाधनों को प्राथमिकता देना और मार्ग प्रदान करना महत्वपूर्ण है।

 

https://www.adda247.com/upsc-exam/uttar-pradesh-draft-population-bill-2021-hindi/

अफ्रीकी कृषि क्षेत्र की क्षमता: भारत के लिए अवसर

  •         अप्रयुक्त क्षमता: चूंकि अफ्रीका में विश्व की 65% कृषि योग्य भूमि है, जो 60% से अधिक कार्यबल को रोजगार प्रदान करती है, और उप-सहारा अफ्रीका के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 20% है।
  •         अफ्रीकी कृषि-तकनीकी क्षेत्र में स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र की क्षमता: जिसमें 2016 और 2018 के मध्य 110% की वृद्धि देखी गई। पिछलेवर्ष, महामारी के बावजूद, यह क्षेत्र में निवेश में रिकॉर्ड वृद्धि का साक्षी बना।
  •         भविष्य की वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण: क्योंकि इसमें एक बड़ा अप्रयुक्त और अविकसित कृषि क्षेत्र है जो उचित रूप से उपयोग किए जाने पर वैश्विक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहायता कर सकता है।

 

अफ्रीका में चीनी आस्थिति का विश्लेषण

  •         महत्वपूर्ण साझेदार: चीन अफ्रीका के सर्वाधिक वृहद व्यापारिक साझेदारों में से एक है औरसर्वाधिक बड़ा ऋणदाता भी है। इसकी कंपनियां क्षेत्र के आधारिक अवसंरचना के बाजार पर प्रभुत्वशाली हैं और अब कृषि-अवसंरचना क्षेत्र में प्रवेश कर रही हैं।
  •         अफ्रीका के प्राकृतिक संसाधनों तक अधिगम, इसके अप्रयुक्त बाजारों और वन चाइना:के लिए समर्थन इस क्षेत्र में चीनी आस्थिति के प्राथमिक संवाहक हैं।
  •         अफ्रीका में औद्योगिक पार्क और आर्थिक क्षेत्र निर्माण: जो चीन की कम लागत वाली, श्रम प्रधान विनिर्माण इकाइयों को आकर्षित कर रहे हैं
  •         प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण: अफ्रीकी कृषि विशेषज्ञों, अधिकारियों औरकृषकों को कौशल आवर्धन और चीन में प्रशिक्षित होने के अवसर प्रदान किए जाते हैं।
  •         बाजार प्रग्रहण पर ध्यान केंद्रित करना: अफ्रीकी बाजार पर हावी होने के लिए ‘ब्रांड चीन’ का निर्माण करके, यहां तक ​​कि अल्पकालिक मुनाफे की कीमत पर भी, यह इनके माध्यम से किया जा रहा है-

o   निमन्त्रक देशों में चीनी मानकों में वृद्धि करके।

o   चीनी तकनीकी कंपनियों द्वारा महत्वपूर्ण दूरसंचार अवसंरचना निर्माण करके।

o   अफ्रीकी फिनटेक  व्यापारिक कंपनियों में उद्यम पूंजी निधियों द्वारा निवेश करके।

o   संपूर्ण क्षेत्र में लघु चीनी उद्यमों का विस्तार करके।

 

 

भारत-अफ्रीका कृषि सहयोग

  •         बहुआयामी आस्थिति: भारतीय लाइन ऑफ क्रेडिट, क्षमता-निर्माण पहल और कई क्षेत्रों में सहयोग के अंतर्गत परियोजनाओं कोक्रियान्वित किया जा रहा है।
  •         संस्थागत और व्यक्तिगत क्षमता निर्माण पहल: जैसे

o   मलावी में भारत-अफ्रीका कृषि और ग्रामीण विकास संस्थान,

o   सुलभ ऋण का विस्तार और मशीनरी की आपूर्ति,

o   कृषि भूमि का अधिग्रहण: भारतीय कृषकों ने अफ्रीका में व्यावसायिक कृषि हेतु 6,00,000 हेक्टेयर से अधिक भूमि क्रय की है।

o   अफ्रीकी कृषि पारिस्थितिकी तंत्र में भारतीय उद्यमियों की उपस्थिति।

  •         सहकारी तंत्र:

o   भारतीय राज्यों के साथ प्रत्यक्ष सहयोग: उदाहरण के लिए, केरल सरकार अपनी सीमित उत्पादन क्षमता को पूर्ण करने के लिए अफ्रीका के देशों से आयात के साथ कच्चे काजू की अपनी अत्यधिक आवश्यकता को पूर्ण करने का प्रयत्न कर रही है।

.           अफ्रीका-कोल्लम काजू का संयुक्त स्वामित्व वाला ब्रांड निर्मित करने का प्रस्ताव है।

 

https://www.adda247.com/upsc-exam/protests-in-cuba-hindi/

चीनी गलतियों से सीखना

  •         चीनी आस्थिति के बारे में नकारात्मक धारणा: द्वीपीय प्रवासी, एक तरफा व्यापार, बढ़तेऋण, स्थानीय व्यवसायों के साथ प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ अधिक से अधिक राजनीतिक और सामाजिक आर्थिक अंतर्संबंधों के कारण।

जमीनी वास्तविकता से संबंध वियोजन:

o   कुछ मामलों में, चीन में प्रशिक्षित की जाने वाली तकनीक स्थानीय रूप से उपलब्ध नहीं है और अन्य में, सहायक संसाधनों के अभाव के कारण सीखे गए प्रशिक्षणों को क्रियान्वित करने में असमर्थता है।

o   भाषाई बाधा: मंदारिन-भाषी प्रबंधकों द्वारा संचालित किए जाने वाले बड़े वाणिज्यिक कृषि भूमियों और स्थानीय बाजारों में छोटे पैमाने पर चीनी कृषकों की उपस्थिति सामाजिक-सांस्कृतिक तनाव में वृद्धि करती है।

 

आगे की राह 

  •         सहकारी और सहयोगी तंत्र को प्रोत्साहन देना: कृषि क्षेत्र के अन्य क्षेत्रों में प्रस्तावित अफ्रीकी-कोल्लम काजू ब्रांड की तर्ज पर।
  •         भारतीय उद्योगों को प्रोत्साहन देना: अफ्रीकी कृषि-व्यवसाय मूल्य श्रृंखलाओं में अपसारण और भारतीय प्रौद्योगिकी कंपनियों और स्टार्टअप को अफ्रीका में भागीदारों के साथ संबंधित करना
  •       सक्षम प्रभाव आकलन: भारत के लिए अच्छी स्थिति में खड़े होने के लिए कृषि में वर्तमान क्षमता निर्माण की पहल।

o   मांग आधारित कौशल विकास कार्यक्रम तैयार करना: देश-विशिष्ट और स्थानीयकृत पाठ्यक्रम तैयार करके।

  •         भारत को बढ़ते चीनी उपस्थिति के प्रति सचेत रहना चाहिए क्योंकि बीजिंग का मॉडल, यदि यहां सफल होता है, तो उसे वृहद वैश्विक दक्षिण के लिए एक प्रतिकृति के रूप में घोषित किया जा सकता है।

 

निष्कर्ष:          भारत ने अफ्रीकी प्राथमिकताओं के अनुरूप होने के लिए विकास साझेदारी को रेखांकित करने के लिए निरंतर कल्याण का चयन किया है। इसलिए, यह उचित है कि हम सामूहिक रूप से अफ्रीका के साथ एक अद्वितीय आधुनिक साझेदारी तैयार करें।

Crafting a unique partnership with Africa (Hindi)_50.1

https://www.youtube.com/channel/UCtKv7_z4rh37OCSEfkZuGow

 

 

 

 

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