भारत में जाति आधारित जनगणना_00.1
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भारत में जाति आधारित जनगणना

प्रसंग

  • हाल ही में, बिहार के मुख्यमंत्री ने भारत के प्रधानमंत्री से मिलने के लिए राज्य के 10 राजनीतिक दलों के एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया एवं जनगणना 2021 के अनुष्ठान का हिस्सा बनने के लिए एक नई जाति जनगणना की मांग की।
  • इससे पूर्व, केंद्रीय गृह राज्य मंत्री ने संकेत दिया था कि सरकार ने नीतिगत रूप में निर्णय लिया है कि जनगणना में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के अतिरिक्त अन्य जाति-वार जनसंख्या की गणना नहीं की जाएगी।

भारत में जाति आधारित जनगणना_50.1

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औपनिवेशिक काल में जाति जनगणना

  • 1872: ब्रिटिश भारत में प्रथम जनसंख्या जनगणना संचालित की गई, जिसमेंव्यक्तियों के जाति से संबंधित प्रश्न भी सम्मिलित थे।
  • 1931: ब्रिटिश भारत में आयोजित यह अंतिम जाति आधारित जनगणना थी। 1872-1931 के मध्य, प्रत्येक जनगणना ने जाति-आधारित आंकड़े एकत्रित किए एवं भारत में विभिन्न जातियों पर प्रश्नों को सम्मिलित किया।
  • 1941: जाति आधारित आंकड़े एकत्र किए गए किंतु उनका प्रकाशन नहीं किया गया।
  • औपनिवेशिक काल में जाति-जनगणना में दलित, आदिवासी, ओबीसी एवं ऊंची जातियां सम्मिलित थीं।
  • जाति आधारित जनगणना कराने का अभिप्राय: जाति आधारित जनगणना के आंकड़ों का प्रयोग तब भारत को विभाजित करने एवं विजित करने के लिए किया जाता था। यह 20वीं शताब्दी के ब्राह्मण-विरोधी आंदोलनों का भी स्रोत था।

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स्वतंत्रता के पश्चात की अवधि में स्थिति

  • 1951-2011 के मध्य: स्वतंत्रता के पश्चात की अवधि में प्रत्येक दशकीय जनगणना में अनुसूचित जाति (एससी)एवं अनुसूचित जनजाति (एसटी) पर आंकड़े सम्मिलित थे, किंतु जाति से संबंधित कोई आंकड़ा एकत्र नहीं किया गया था।
  • इसलिए, 1931 के बाद से जाति आधारित जनगणना के अभाव में, भारत में ओबीसी जनसंख्या का कोई उचित अनुमान नहीं है।
    • मंडल आयोग ने अनुमान लगाया कि भारत में जनसंख्या का 52% ओबीसी वर्ग में आता है।
  • 1931 के बाद से, भारत में सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में व्यापक परिवर्तन आया है। इसलिए, भारत की वर्तमान जातिगत वास्तविकताओं को प्रग्रहित करने हेतु भारत में एक नई जाति-आधारित जनगणना की मांग की जा रही है।

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सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना 2011

  • सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना (एसईसीसी) 2011 में आयोजित की गई थी। यह स्वतंत्रता के पश्चात के भारत में जातियों की सूची के लिए सर्वाधिक वृहद अभ्यास था एवं इसमें व्यापक स्तर पर असमानताओं को खोजने की क्षमता है।
  • संचालन मंत्रालय: सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामीण विकास मंत्रालय एवं शहरी क्षेत्रों में आवास तथा शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय द्वारा आयोजित की गई थी।
  • जातिगत आंकड़ों को छोड़कर एसईसीसी आंकड़ों को 2016 में दोनों मंत्रालयों द्वारा अंतिम रूप दिया गया एवं प्रकाशित किया गया था।
  • जाति के अपरिष्कृत आंकड़े सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय को सौंप दिए गए थे
  • मंत्रालय ने आंकड़ों के श्रेणीकरण एवं वर्गीकरण  हेतु नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पंगारिया के अधीन एक विशेषज्ञ समूह का गठन किया।
  • यद्यपि, मात्र ग्रामीण एवं शहरी परिवारों में व्यक्तियों की आर्थिक स्थिति का विवरण जारी किया गया था। जाति के आंकड़े अभी तक जारी नहीं किए गए हैं।

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जाति जनगणना एवं सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना के मध्य अंतर

जनसंख्या जनगणना  सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना
जनगणना भारतीय आबादी की एक तस्वीर प्रदान करती है एसईसीसी राज्य सहायता के लाभार्थियों की पहचान करने का एक उपकरण है
जनगणना, 1948 के जनगणना अधिनियम के अंतर्गत आती है एवं सभी आंकड़े गोपनीय माने जाते हैं एसईसीसी में दी गई सभी व्यक्तिगत जानकारी सरकारी विभागों द्वारा परिवारों को लाभ प्रदान करने एवं /  अथवा प्रतिबंधित करने के लिए उपयोग के लिए खुली हैं।

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