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Hindi Questions For DSSSB 2017 Exam

Hindi Questions For DSSSB 2017 Exam_30.1


Directions (1-5): नीचे दिए गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
भाषा का प्रयोग दो रूपों में किया जा सकता है-एक तो सामान्य जिससे लोक में व्यवहार होता है तथा दूसरा रचना के लिए जिसमें प्रायः अलंकारिक भाषा का प्रयोग किया जाता है। राष्ट्रीय भावना के अभ्युदय एवं विकास के लिए सामान्य भाषा एक प्रमुख तत्व है। मानव समुदाय अपनी संवेदनाओं, भावनाओं एवं विचारों की अभिव्यक्ति हेतु भाषा का साधन अपरिहार्यतः अपनाता है। इसके अतिरिक्त उसके पास कोई अन्य विकल्प नहीं है। दिव्य-ईश्वरीय आनंदानुभुति के संबंध में भले ही कबीर ने ‘गूंगे केरी शर्करा’ उक्ति का प्रयोग किया था, पर इससे उनका लक्ष्य शब्द-रूपा भाषा के महत्व को नकारना नहीं था। प्रत्युत उन्होंने भाषा को ‘बहता नीर’ कह कर भाषा की गरिमा प्रतिपादित की थी। विद्वानों की मान्यता है कि भाषा तत्व राष्ट्रहित के लिए अत्यावश्यक है। जिस प्रकार किसी एक राष्ट्र के भू-भाग को भौगोलिक विविधताएँ तथा उसके पर्वत, सागर, सरिताओं आदि की बाधाएँ उस राष्ट्र के निवासियों के परस्पर मिलने-जुलने में अवरोध सिद्ध हो सकती है। उसी प्रकार भाषागत विभिन्नता से भी उनके पारस्परिक सम्बन्धों में निर्बाधता नहीं रह पाती। आधुनिक विज्ञानयुग में यातायात एवं संचार के साधनों की प्रगति से भौगोलिक-बाधाएँ अब पहले की तरह बाधित नहीं करती। इसी प्रकार यदि राष्ट्र की एक सम्पर्क भाषा का विकास हो जाए तो पारस्परिक सम्बन्धों के गतिरोध बहुत सीमा तक समाप्त हो सकते हैं।
मानव-समुदाय को एक जीवित-जाग्रत एवं जीवन्त शरीर की संज्ञा दी जा सकती है। उसका अपना एक निश्चित व्यक्तित्व होता है। भाषा अभिव्यक्ति के माध्यम से इस व्यक्तित्व को साकार करती है, उसके अमूर्त मानसिक वैचारिक स्वरूप को मूर्त एवं बिम्बात्मक रूप प्रदान करती है। मनुष्यों के विविध समुदाय हैं, उनकी विविध भावनाएँ हैं, विचारधाराएँ हैं, संकल्प एवं आदर्श हैं, उन्हें भाषा ही अभिव्यक्त करने में सक्षम होती है। साहित्य, शास्त्र, गीत-संगीत आदि में मानव-समुदाय अपने आदर्शो, संकल्पनाओं, अवधारणाओं एवं विशिष्टताओं को वाणी देता है, पर क्या भाषा के अभाव में काव्य, साहित्य, संगीत आदि का अस्तित्व सम्भव है? वस्तुतः ज्ञानराशि एवं भावराशि का अपार संचित कोष जिसे साहित्य का अभिधान दिया जाता है, शब्द रूप ही तो है। अतः इस सम्बन्ध में वैमत्य की किंचित् गुंजाइश नहीं है कि भाषा ही एक ऐसा साधन है जिससे मनुष्य एक-दूसरे के निकट आ सकते हैं, उनमें परस्पर घनिष्ठता स्थापित हो सकती है। यही कारण है कि एक भाषा बोलने एवं समझने वाले लोग परस्पर एकानुभूति रखते हैं, उनके विचारों में ऐक्य रहता है। अतः राष्ट्रीय भावना के विकास के लिए भाषा तत्व परम आवश्यक है।

Q1. उपर्युक्त अनुच्छेद का सर्वाधिक उपयुक्त शीर्षक है-
(a) राष्ट्रीयता और भाषा-तत्व 
(b) बहता नीर भाषा का
(c) व्यक्तित्व-विकास और भाषा
(d) साहित्य और भाषा तत्व 

Q2. मानव के पास अपने भावों, विचारों, आदर्शो आदि को सुरक्षित रखने के सशक्त माध्यम है-
(a) भाषा और शैली 
(b) साहित्य और कला 
(c) साहित्य शास्त्र एवं संगीत 
(d) व्यक्तित्व एवं चरित्र 

Q3. ‘भाषा बहता नीर’ से आशय है-
(a) लालित्यपूर्ण भाषा 
(b) साधुक्कड़ी भाषा 
(c) सरल-प्रवाहमयी भाषा
(d) तत्समनिष्ठ भाषा 

Q4. राष्ट्रीय भावना के विकास के लिए भाषा-तत्व आवश्यक है, क्योंकि-
(a) वह ज्ञान राशि का अपार भंडार है
(b) वह शब्दरूपा है और उसमें साहित्य सर्जना संभव है
(c) वह मानव-समुदाय के लिए अत्यंत मत्वपूर्ण साधन है 
(d) वह मानव-समुदाय में एकानुभूति और विचार-ऐक्य का साध्न है

Q5. ‘गूंगे केरी शर्करा’ से कबीर का अभिप्रेत है कि ब्रह्मानंद की अनुभूति-
(a) अनिर्वचनीय होती है
(b) अत्यन्त मधुर होती है 
(c) मौनव्रत से प्राप्त होती है 
(d) अभिव्यक्ति के लिए कसमसाती है 
Directions (6-10): नीचे दिए गए परिच्छेद में कुछ रिक्त स्थान छोड़ दिए गए हैं तथा उन्हें प्रश्न संख्या में दर्शाया गया है। ये संख्याएँ परिच्छेद के नीचे मुद्रित हैं, प्रत्येक के सामने (a), (b), (c), और (d) विकल्प दिए गए हैं। इन चारो में से कोई एक इस रिक्त स्थान को पूरे परिच्छेद के सदंर्भ में उपयुक्त ढंग से पूरा कर देता है। आपको वह विकल्प ज्ञात करना है, और उसका क्रमांक ही उत्तर के रूप में दर्शाना है। दिए गए विकल्पों में से उपयुक्त विकल्प का चयन करना है।
यह सत्य है कि कौरव और पाण्डव दोनों पक्षों के वीर (6) के युद्ध को धर्मयुद्ध मानकर लड़ रहे थे, किन्तु धर्म पर दोनों में से कोई भी अडिग नहीं रह सका। “लक्ष्य प्राप्त हो चाहे न हो, किन्तु हम (7) पर पाँव नहीं रखेंगे।” इस निष्ठा की अवहेलना दोनों पक्षों से हुई और दोनों पक्षों के सामने साध्य प्रमुख और साधन गौण हो गया। अभिमन्यु की हत्या (8) से की गई तो, भीष्म, द्रोण, भूरिश्रवा, कर्ण और स्वयं दुर्योधन का वध भी पुण्य से नहीं हुआ। जिस युद्ध में भीष्म, द्रोण और श्रीकृष्ण वर्तमान हो, उस युद्ध में भी धर्म का पालन नहीं हो सका, इससे तो यही निष्कर्ष निकलता है कि युद्ध कभी भी धर्म के पथ पर रहकर लड़ा नहीं जा सकता। (9) का आदि भी अधर्म है, मध्य भी अधर्म है और अन्त भी अधर्म है। जिसकी आँखों पर लोभ की पट्टी नहीं बंधी है, जो क्रोध, आवेश अथवा स्वार्थवश अपने (10) को भूल नहीं गया है, जिसकी आँख साधना की अनिवार्यता से हटकर साध्य पर ही केन्द्रित नहीं हो गई है, वह युद्ध जैसे मलिन कर्म में भी प्रवृत्त नही होगा। युद्ध में प्रवृत्त होना ही इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य अपने रागों का दास बन गया है। फिर जो रागों की दासता करता है, वह उनका नियंत्रण कैसे करेगा। 
Q6.
(a) हस्तिनापुर 
(b) दिल्ली 
(c) हल्दीघाटी 
(d) कुरूक्षेत्र 
Q7.
(a) कुमार्ग 
(b) सन्मार्ग 
(c) अपमार्ग 
(d) धर्ममार्ग 
Q8.
(a) शाप 
(b) श्राप 
(c) बल 
(d) पाप 
Q9.
(a) अहिंसा 
(b) हिंसा 
(c) भय 
(d) क्रूरता 
Q10.
(a) ईमानदारी 
(b) हैसियत 
(c) इच्छा 
(d) कर्तव्य 
Solutions:
S1. Ans. (a)
S2. Ans. (b)
S3. Ans. (c)
S4. Ans. (d)
S5. Ans. (a)
S6 Ans. (d)
S7 Ans. (a)
S8 Ans. (d)
S9 Ans. (b)
S10 Ans. (d)